स्पर्श दीक्षित (लेखक टी टाइम्स ग्रुप के विशेष सम्वादाता है)

ब्रह्मांड में घूमता कालचक्र सदैव इतिहास का रचयता रहा  है। आदिगंगा के नाम से जानी जाने वाली गोमती नदी के किनारो की हर सिलवट बहुत से इतिहासों को परत दर परत समेटे हुई है। सुमित्रानंदन लखन के नाम से जाना जाने वाला लखनऊ एक तरफ लक्ष्मण की त्याग, तपस्या और आदरभाव को प्रकट करता है तो वही दूसरी ओर नवाबों का यही शहर नवाबों की शेरो सुख़न, शौकों शुगल को भी बयान करता है।
यह शहर गवाह है रस भीगी चांदनी में की जाने वाली ठुमरी का, यह शहर गवाह है  बेगम अख़्तर की शमीमेनाज की गमक का जो लोगों के दिलों दिमाग को छू जाया करती थी। यह  बात किसी से छुपी नहीं है की लखनऊ तहजीब, नफासत, पूरतकल्लुफ, आराइशो और लिबासो का शहर रहा है,  लेकिन आज अफसोस की बात यह है की तमाम इलमो अदब की गतिविधियों का केंद्र रही, नवाबों की जागीर के यह नमूने कहीं ना कहीं बरबादी की कगार पे है।
कैसरबाग:

वक्त था 1847 का जब कैसर जहां के नाम से जाने, जाने वाले जनाब वाजिद अली शाह लखनऊ के तख्त पर जलवा ए आफ्रौश हुए। कैसर जहां उनका खुद का नाम था जिसकी वजह से इस जगह का नाम कैसरबाग़ पड़ा जिसको बनवाने में लगभग 80 लाख का खर्चा आया।
यहां के चौराहे के बीचों बीच एक अशोक स्तम्भ है जो गंगा जमुनी तहजीब का उदाहरण है और वही दो लाखी दरवाजे इसका गौरव बढ़ाते थे,  लेकिन आज यह दरवाजे एवम कैसरबाग बर्बादी की कगार पर है। आये दिन के भीषण जाम और कुछ दूरी पर बने हुए शहर के सबसे बड़े कूड़ाघर इसका सशक्त उदाहरण है। वही कैसरबाग़ की बिल्डिंगो की भी हालत काफी खराब है जिनमें मैंटेनेंस की कमी दिखती है।
लाखी दरवाजे:

कैसरबाग के पूर्व एव्म पश्चिम में स्तिथ दो लाखी दरवाजे आज भी कैसरबाग की खूबसूरती के मूक गवाह है। इनको लाखी दरवाजा इसलिये कहा जाता है क्योंकि सन 1850 में इनको बनवाने में एक लाख रुपये का खर्चा आया था। ध्यान से देखने पर यह पता चलता है की इन दरवाजो पर मछलिया बनी हुई और उन मछलियों के बीच एक आसफ़ी गुलदस्ता है जिसे ‘हिंद ईरानी बूटा’ कहते है, और इसमें बनी हुई जलपरिया बादशाही ताज को सम्भालें हुई है।
एक वक्त था जब अवध का झंडा इस पर शान से लहराता था लेकिन वक्त ने कुछ ऐसा करवट बदला की सल्तनत ए अवध की शान ये दरवाजे आज बर्बादी की कगार पे है। जल परियों एवम मछलियों की आकृति धीरे मिटती जा रही है,अंदर बने लकड़ी के दरवाजे लगभग टूट चुके है, और उन लकड़ी के दरवाजों को सहारा देती दीवारें भी धीरे धीरे दरक रही है, इसको देखने से लगता है की कहीं ऐसा ना हो की लाखी दरवाजे सिर्फ किताबों में सिमट कर ही रह जाये। बरेली की बर्फी, बुलेट राजा,इश्कजादे, जौली एलएलबी 2, उमराओजान जैसी मशहूर बालीवुड फिल्मों का गवाह रहे यह दरवाज़े आज दरकते चले  जा रहे है।
रूमी दरवाजा:

शाम -ए-अवध की सल्तनत में जिस समय ढलते हुए सूर्य देव अपनी किरणें इस रूमी  दरवाजे पर डालते थे तो इसकी बादामी  रंग की दीवारें एक अनुपम, आलौकिक छटा बिखेर कर सल्तनत ए अवध  की कीर्ति एवम यश का बखान करता था। 60 फिट ऊंचा लखौरी ईंट और बदामी चूने के काम से बनाया गया यह हस्ताक्षऱ भवन मिर्जा दबीर और मीर अनीस की नूर बिखेरती कलमों का गवाह है।
राजपूतों के प्रमुख मंगल चिन्ह कमल का इसमें इस्तेमाल इस बात को दर्शाता है की गंगा जमुनी तहजीब और हिंदू मुस्लिम एकता का एक प्रतीक है।इस दरवाजे पर स्तिथ चंद्राकार अर्धगुम्बद वास्तुशिल्प कियाफतउल्ला की देन है। टर्की के सुल्तान का दरबार भी बिल्कुल इसी तरह का होने के कारण ये टर्किश गेट भी कहलाता है।
इस शंखकार द्वार की महराबे कमान की तरह झुकी हुई है , लेकिन आये दिन हजारों की तादात में यहां से वाहनों की आवाजाही रहती है जिसके कारण आर्कयोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने माना है की दिन पे दिन यह हस्ताक्षऱ भवन कमजोर हो रहा है,  अत: आने वाली पीढ़ियों की यह जिम्मेदारी है की लखनऊ को हस्ताक्षरहित होने से बचाये।
बटलर पैलेस:

सन 1907 में जब सर हारकोर्ट बटलर डिप्टी कमिश्नर अवध बने तभी से उनकी राजा महमूदाबाद से गहरी दोस्ती हो गयी थी। शाम -ए-अवध के दीदार करने के अत्यंत शौकीन सर बटलर के लिये इस पैलेस का निर्माण  1915 में शुरू किया गया लेकिन 1923 में आयी बाढ के कारण यह खराब हो गया और इसका निर्माण रोकना पड गया।
तत्कालीन प्रभावशाली हस्तियों में शामिल पंडित श्री मोती लाल नहरू, पटना के प्रेसिडेंट यहां रुका करते थे क्योंकि उत्तरप्रदेश के सबसे शानदार गेस्ट हाउसेस में से एक था, लेकिन 100 वर्ष से ज्यादा पुरानी यह ऐतिहासिक धरोहर आज दुनिया की नजरो से दूर अव्यवस्था का उदाहरण है।
इसमें अंदर जाते ही बायें हाथ पे गोलाकार जीना आपको पहली, दूसरी व तीसरी मंजिल तक पहुंचा देगा लेकिन हर मंजिल पर टूटे हुए लकड़ी के बेश कीमती दरवाजे, बिखरे हुए कांच, टूटी हुई दीवारें इसकी बेकद्री की दास्तान को बयान करती है, और इसकी छत पर पहुंचने के बाद बनी हुई सभी चार मीनारों के अंदर जा कर जब आप ढलते सूर्य को देखेंगे तब आपको यह पता चलेगा की शाम ए अवध इतनी ख़ूबसूरत क्यों कहीं जाती है। इसके पास बनी झील भी बेकद्री का शिकार है। लखनऊ के सबसे पाश इलाके में स्तिथ बटलर पैलेस पर अगर सरकार ध्यान दे तो यह ख़ूबसूरत पयर्टन स्थल अथवा गेस्ट हाउस बन सकता है इसमें कोई संशय नहीं है।
मक़बरा सआदत अली खा:

लखनऊ के कैसरबाग में स्तिथ यह मकबरा अवध की मिट्टी की महक का एक जीता जागता सुबूत है। यहाँ पे दो खामोश जादूभरी इमारते स्तिथ है।एक बड़ा मकबरा नवाब सआदत अली खां का है तो वही दूसरा छोटा मकबरा उनकी बेगम ख़ुर्शीदजादी बेगम का है।  जब नवाब सआदत अली खां नहीं रहे तो गाजीउद्दीन हैदर ने उन्हें एक मकान में दफना कर एक आलिशान मकबरा बनाया।
इस बड़े मकबरे में एक शानदार गुम्बद है जिस पर सोने की कलंगी लगी है। भीतरी कक्ष में छूने के उभार के बहुत सुंदर बेलबूटे है वही छोटे मकबरे की सजावट और महराबे खास तरह की है, लेकिन आज अवधी इतिहास की गवाह यह धरोहर दिन पे दिन खराब होती जा रही है। इसके गुम्बद पर इतनी ज्यादा मिट्टी जम चुकी है की इसका असली बदामी रंग भी अब दिखायी तक नहीं देता। इसके ठीक पीछे बटलर पार्क की झील भी अपने आखरी दिन रही है। इस इमारत को देख कर ऐसा लगता है की मानो नवाब सआदत अली खां और उनकी बेगम ख़ुर्शीदजादी की रूह यह सवाल कर रही हो की कब यह इमारत 100 वर्ष पहले की तरह अपना नूर बिखेरेंगी।

इन इमारतों को देख कर मीर अनीस का एक मरसीहा याद आता है:

“क्यों कर कोई ग़मज़दा फरियाद करें, 
जब मुल्क को यगनीम बरबाद करें, 
मांगे यह दुआ की फिर खुदा बंदे करीम, 
उजड़े हुए लखनऊ को आबाद करें”
मोदी-योगी सरकार के लूटतंत्र के जाल में फंसा किसान: अखिलेश
प्रसपा में शामिल हुए लोग

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