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लॉकडाउन से आर्थिक संकट की ओर बढ़ता भारत!

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नरेश दीक्षित


म्पूर्ण देश को बिना किसी तैयारी के लाक डाउन में डालने से अर्थ व्यवस्था लड़खड़ाने लगी है। देश के अधिकांश शहरों से मजदूरों के पलायन, थोक मंडियों के बन्द होने, सार्वजनिक वाहनों के न चलने, सप्लाई चेंन बन्द होने, तथा पुनः पटरी पर लाने के लिए 14 अप्रैल को लाक डाउन समाप्त होने के बाद भी काफी समय लगेगा । लाक डाउन के बाद जब देश की आम जनता अपनी जरूरत के लिए बाजारों में उतरेगी बाजारों में सामान उनकी इच्छा अनुसार नहीं होंगे तो अफरा-तफरी होगी? सप्लाई चेंन चालू रखने वाले ग्रामीण मजदूर कोरोना संक्रमण के चलते शहरों से पलायन कर गये है।

अब मंडियों में कौन कंधा लगाकर ट्रकों को लोड़-अपलोड करेगा,माल गाडिय़ों से कौन माल उतारेगा, फैक्ट्रियां कैसे चलेंगी,लालाओं की दुकानों पर झाडू-पोछा कौन लगायेगा? भारत सरकार की कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए कोई स्थाई नीति नहीं है यहाँ तक आर्थिक पैकेज की घोषणा बहुत विलम्ब से किया गया, इसमें भी देश की आर्थिक रीढ़ कहें जानें वाले करीब 30 लाख ट्रक ड्राइवरों के लिए कुछ भी नहीं था ? हाइवे, स्टेट हाइवे,नेशनल हाईवे के सभी ढांबे बन्द है आप ही सोचिये जब ढांबे बन्द तो ट्रक कैसे चलेंगे?

सरकार एवं अधिकारियों के आपसी तालमेल की कमी से अभी तक कोई भी कारगर नीति कोरोना संक्रमण रोकने के लिए नहीं बनी है। कभी सरकार कहती है दूध,फल,सब्जी,परचून,दवाइयों,पानी सप्लाई की दुकानें खुली रहेगी, फिर आदेश होता इनकी सप्लाई घर-घर होगी, अब कहाँ जा रहा ऐसी सप्लाई के लिए परमिट जारी किए जा रहे और परमिट धारक ही मोहल्ले में जाकर आवश्यक वस्तुएं बेचेंगे। सरकार की एक नीति न होने के कारण मंडियों में सब्जियां,फल सड़ने के कारण फेंके जा रहे है। सरकार कहती है सबको खाना दिया जायेगा क्या यह मुमकिन है?

सरकार के पास देश की 1•25 करोड़ जनता के लिए आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई करने की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार और उनके अधिकारी सिर्फ गाल बजा कर जनता को झूठा आश्वासन देकर भ्रमित कर रहे हैं तभी तो बिहार,उतर प्रदेश,मध्यप्रदेश,राजस्थान का लाखों मजदूर काय॔ करने के अपने पसंदीदा शहर दिल्ली,मुंबई छोड़ कर गांवों को भागने पर मजबूर हुए हैं? सरकार पहले कहती है कोरोना के स॔किल को तोड़ना है,अब कहती है सोशल डिस्टेंसिंग रखना है क्या परिवार में,खेतों में काम करने वाले,वी आई पी कल्चर वाले नेता,पुलिस,सेना,पैरामिलेट्री फोस॔,डाक्टर इत्यादि सोशल – डिस्टेंसिंग बना कर काय॔ कर सकते हैं?

कोरोना का स॔किल तोड़ना तो लाजिक लगता है, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग सभी लोग कैसे कर पायेंगे? देश के चंद लोग जो अपने को भारत का भाग्य विधाता समझते है जमीनी हकीकत न समझ कर सरकार की नाकामियों को छुपाने के लिए टीवी चैनलों, सोशल मीडिया, मीडिया पर ज्ञान बांट कर देश के करोड़ों किसानों, मजदूरों, गरीब जनता को भ्रमित कर रहे हैं और कह रहे हैं लाक डाउन न मानने वालों को कवारंटाइन में डाल देना चाहिए ऐसी भाषा वही बोल सकता है जो देश की 70 प्रतिशत जनता की पीड़ा को न समझता हो ऐसे लोग सरकार के कुछ टुकड़ो पर पल कर सिर्फ सरकार की चाटुकारिता करते हैं?

क्या ऐसे अधिकारी,नेता,तथा अपने को विशेषज्ञ, देश का ज्ञानी जो सिर्फ गाल बजाते है क्या किसी गांव की हकीकत देखने के लिए 21 दिन के लिए लाक डाउन में रह सकते है तो बेहतर ज्ञान उनको होता? आज देश की हालत इन ज्ञानियों ने क्या बना दी है आने वाला समय बताएगा? लोगों के रोजगार छिन गए है, दिहाडी मजदूर शहरों से पलायन कर गये है। देश के ज्ञानी या सरकार बताएं इनके चले जाने से देश की सप्लाई चेंन कैसे चालू होंगी ?

अभी तक वाहन उद्योग को 30 हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है और पय॔टन उद्योग को एक माह में 3•8 करोड़ की हानि हो चुकी हैं। आने वाला समय देश के लिए खतरे के बादल अभी से मंडराने लगे हैं। अब भारत सरकार के अधिकारी कहते हैं लाक डाउन को बढाया नहीं जायेगा? लेकिन क्या देश की जनता इस पर विश्वास करेगी? जब तक इसका सही एलान वही नहीं करेंगे जो हर बार एक नया एलान रात्रि आठ बजे करते हैं?

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