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देश की मीडिया पर स्वतंत्रता का प्रश्न चिन्ह?

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नरेश दीक्षित
संपादक (समर विचार)


अब देश की मीडिया की स्वतंत्रता सरकारो पर निर्भर है मीडिया की आवाज दबाने के लिए भारत सरकार के सूचना-प्रसारण मंत्रालय द्वारा तरह – तरह की एडवायजरी जारी की जाती है जो असंवैधानिक होती है और इनका कोई गजट भी प्रकाशित नही किया जाता है, और न ही पी आई वी एक्ट में कोई संशोधन किया जाता है।
एडवायजरी से ही देश की तमाम भाषाओ में प्रकाशित समाचार पत्र पत्रिकाओ को हाका जाता है शायद भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है जो कानून से न चल कर एडवायजरी की मन मर्जी से समाचार पत्र को प्रकाशित कराया जाता है।
देश के इतिहास में पहली बार मोदी सरकार ने न्यूज प्रिंट पर 5% टैक्स थोप कर लघु एवं मध्यम समाचार पत्रपत्रिकाओ को बन्दी के कगार पर पहुंचा दिया है। सरकार से देश के तमाम पत्रकार संगठनो ने न्यूज प्रिंट से जी एस टी हटाने की मांग कर रहे है लेकिन जी एस टी परिषद मांग को कूड़े के ढेर में फेंक देती है और जान बूझ कर समाचार पत्रो से जी एस टी नही हटा रही है क्योंकि उस पर कार्पोरेट मीडिया घरानों का दबाव रहता है।
जब न्याय के लिए आवाज उठाई जाती है तो हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक खामोश हो जाते है और जब यही न्याय क॔ता सार्वजनिक मंचो पर भाषण करते है तो देश की मीडिया को स्वतंत्र बनाने की जोर दार वकालत करते है। सरकार एवं न्यायालय की दोहरी मांनसिकता के कारण आज देश की स्वतंत्र मीडिया सरकारी तंत्र की गुलाम बन कर रह गई है।
देश के प्रधान न्यायाधीश इंटरनेशनल ला एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि ”लोकतांत्रिक समाज में प्रेस की आजादी तमाम स्वतंत्रता की जननी है, नि:संदेश संविधान के तहत प्रदत्त यह सबसे शानदार और अमूल्य अधिकार है इसमें जानने का अधिकार और सूचित करने का अधिकार समाहित है।”
उन्होंने कहा कि मीडिया के लिए कोई दिशा निर्देश नही होना चाहिए उन्हे अपना दिशा-निर्देश खुद बनाने दीजिए और उनके मुताबिक चलने दीजिए किसी भी प्रकार से कुछ थोपना नही चाहिए ।अब क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश की कही गई बात पर मोदी सरकार अमल करेगी?

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