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क्या मुख्यमंत्री जी प्रदेश से भ्रष्टाचार हटाने में सक्षम है?

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नरेश दीक्षित

प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 2 साल में पुरे प्रदेश की खाक छान मारी है। जनपदों में हजारों करोड़ की योजनाओं का लोकार्पण एवं शिलान्यास कर चुके हैं। 2017 के विधानसभा चुनावों में जनता से वादा किया था कि प्रदेश के युवाओं को रोजगार देंगे, किसानों का सम्पूर्ण कर्ज़ मांफ करेंगे, प्रदेश में कानून व्यवस्था का राज कायम करेंगे,बहनों महिलाओं को सुरक्षा का वातावरण देंगे। लेकिन आज प्रदेश की कानून व्यवस्था छिन्न-भिन्न है भ्रष्टाचार (Corruption) पर लगाम नहीं लग पा रहा है।
और अब मुख्य मंत्री जी अपनी छवि बनाने के लिये केंद्र सरकार की भांति यूपी सरकार के भ्रष्ट एवं महाभ्रष्ट अधिकारियों को हटाने के लिये प्रयत्नशील हैं तथा 50 साल के अधिक, कर्मचारियों,अधिकारियों को वी आर एस देकर हटाना चाहते हैं? मुख्यमंत्री जी अपने नौ रत्नों के सहारे सरकार की छवि बनाना चाहते हैं लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही हैं। शासन में बैठे आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अधिकारियों में कार्य करने की रूचि नहीं है। जब तक वरिष्ठ अधिकारियों की कार्य संस्कृत नहीं बदलेंगी सुधार मुमकिन नहीं है।
शासन में बैठे अधिकारियों की नेम प्लेट के साथ ही उनके मिलने का समय 4 से 5 बजे लिखा है लेकिन शायद ही कोई अधिकारी लिखित समय पर मिलता हो। आप किसी भी अधिकारी के भ्रष्टाचारों की शिकायत साक्ष्यों सहित दें परन्तु वरिष्ठ अधिकारी इस पर कोई निर्णय नहीं लेते। सरकार के 2 वर्षो के कार्य काल में विभिन्न विभागों के 200 से ज्यादा छोटे अधिकारियों एवं कर्मचारियों का निलंबन, डिमोशन के दंड दिए हैं। इसके अलावा 150 से अधिक अधिकारी सरकार के राडार पर बताए जाते है।
मुख्यमंत्री जी क्या भ्रष्टाचार में डूबे मंत्री, विधायक दर्जनों आईएएस,आईपीएस,आई एफ एस जैसे भ्रष्टों को हटाने के लिए कोई स्कीम लांच करेंगे? उत्तर प्रदेश में यूपी आरएनएन, यूपी पीपीएल, यूपी सिडको, उप्र जल निगम, उप्र आवास विकास परिषद, उप्र पावर कारपोरेशन जैसे न जाने कितने निगमों में आईएएस नौकरशाह विराजमान हैं। इन निगमों भ्रष्टाचार चरम पर है यहाँ तक की सरकार ने निर्माण कार्यो में पारदर्शिता बनाएं रखने के लिए ई – टेंडरिग शुरू की गई लेकिन वह भी अधिकारियों ने फैल कर दी है।
सिर्फ नाम के लिये ई- टेंडरिग प्रक्रिया अपनाई जाती हैं। टेंडर पूल कराना टेंडर किस पार्टी को देना यह कमीशन के आधार पर तय होता है। मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की सरकार चलाने के लिए अपने दर्जनों चापलूस रत्नों को शासन के महत्वपूर्ण विभागों में बैठाल रखा है और उन्हे एक से अधिक विभाग पुरस्कार स्वरुप दिए गए हैं जबकि उन्ही विभागों में सबसे अधिक भ्रष्टाचार हो रहा है। प्रदेश के मुख्य सचिव का कार्य काल समाप्त होने के बाद भी आज तक कोई नया मुख्य सचिव मुख्यमंत्री जी नियुक्त नहीं कर पाए है।
उन्ही का कार्यकाल बढ़ा कर सेवाएं ली जा रही हैं। जबकि मुख्य सचिव प्रदेश का प्रशासन चलाने में पूर्णतः असफल है। वह कुछ भी लिखते रहें या अपने अधिनस्थों को फोन करते रहे कोई भी अधिकारी गंभीरता से नहीं लेता है। अब तक कोई नया मुख्य सचिव क्यों नहीं मुख्यमंत्री जी नियुक्त कर पाए यह भी एक भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। पिछले वर्ष 29 जुलाई को प्रदेश में औद्योगिक निवेश का शुभारंभ मुख्यमंत्री जी ने मा प्रधानमंत्री जी से कराया था जिसकी तैयारी में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाया गया था।
इसके पूर्व फरवरी माह में भी इन्वेस्टर्स मीट का आयोजन किया गया था और बताया गया था कि चार लाख छब्बीस हजार करोड़ रूपये के एमओयू साइन विभिन्न कंपनियों ने किये हैं। कंपनियों के साइन से ही प्रदेश की जनता से वादा किया गया था कि प्रदेश में कंपनियों के निवेश से जो रोजगार पैदा होगें उनमें से 90 प्रतिशत रोजगार प्रदेश के नौजवानों के लिये आरक्षित होगें। रोजगार के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें हाँकने वाली सरकार को बताना चाहिए कितने एम ओ यू धरातल पर उतर कर कंपनियाँ कार्य कर रही हैं?
और प्रदेश के कितने जनपदों में नौजवानों को रोजगार मिला है। जनता से झूठ बोलना भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है? मुख्यमंत्री जी ने प्रदेश की सरकार का कार्य भार संभालते ही कुछ ऐसे काकस किस्म के आई ए एस अधिकारियों की माया जाल में फंस गए है कि अब वह सरकार की आंख, कान, नाक बन गए है उनके इशारों पर चलने का नतीजा यह है कि प्रदेश से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो रहा है।
कानून व्यवस्था की स्थिति पुरे प्रदेश की जनता समझ रही है, विकास की किरणें जहाँ कहीं सरकार की पहुँच रही हैं अधिकांश भ्रष्टाचार के जाल में फंस गई है क्षेत्रीय विधायक उन योजनाओं से उगाही कर हैं फलस्वरूप न तो योजनाएं समय से पूरी हो रही है और न मानक के अनुसार निर्माण हो रहा है। मुख्यमंत्री जी जब तक आप ऐसे चाटुकार अधिकारियों से घिरे रहेंगे तब तक उत्तर प्रदेश से न तो भ्रष्टाचार खत्म होगा न बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा और न ही प्रदेश की कानून व्यवस्था में सुधार होगा और न ही ग्रामीण, शहरी क्षेत्रों में बिजली पानी मिलेगा।
यदि आप प्रदेश के विकास में चार-चांद लगाना चाहते है तो पहले ऊपर के अधिकारियों की सर्जरी करनी होगी। चापलूस किस्म के आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अधिकारियों को निकाल बाहर करना होगा। ऐसा करने से उनके नीचे के अधिकारियों में हडकंप मचेगा और उनकी कार्य संस्कृति में लाजिमी सुधार होगा। छोटे अधिकारियों एवं कर्मचारियों को हटाने से प्रदेश में न तो आप की छवि बनेगी और न ही सरकार के संकल्प पत्र के अनुसार प्रदेश का विकास होगा।

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