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‘अडानी’ के लिए एक लाख पेड़ों की बलि चढ़ेगी!

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नरेश दीक्षित

प्रधानमंत्री 15 अगस्त को ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से पर्यावरण के संरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे उधर छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य परसा कोल ब्लॉक के वन क्षेत्र में लगभग एक लाख पेड़ काटने का आर्डर दिया जा चुका है। हसदेव अरण्य का यह वन क्षेत्र मध्य प्रदेश के सबसे बड़े और पुराने (अब छत्तीसगढ़) फारेस्ट इलाके में से एक है। इन जंगल में गोंड आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं।
12 जुलाई को दिए गए आदेश, जो कुछ दिन पहले ही विभाग की वेबसाइट पर अपलोड हुए है, उसमें पता चला है कि परसा कोल ब्लाक अडानी को ओपन कास्ट माइनिंग (खुली खदान) के लिए केन्द्रीय पर्यावरण विभाग से मंजूरी मिल गई है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि केन्द्रीय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन समिति की बैठक में प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने कोई भी आपत्ति नहीं जताई है।
ओपन कास्ट माइनिंग में क्षेत्र से मिट्टी और वनस्पतियों को हटाने के बाद कोयले के लिए खुदाई होती है। मंत्रालय ने 2100 एकड़ के परसा ओपन कास्ट माईन स्टेज वन का फारेस्ट क्लीयरेंस 15 जनवरी 2019 को दिया है, जो भूपेश बघेल सरकार की अनुमति का इंतजार कर रहा था। अब यह अनुमति भी उसे मिल गई है। अडानी की कंपनी कुछ दूसरी कंपनियों के साथ मिल कर इन खदानों में कोयला खनन का काम करने जा रही है, जबकि यही कांग्रेस अभी तक एमडीओ के तौर पर कोयला खनन का विरोध करती आई थी।
यह वही इलाका है जिसे मनमोहन की संप्रग सरकार के कार्यकाल में वन्य जीवों और श्रेष्ठतम पर्यावरणीय परिस्थित के कारण प्रवेश निषिद्ध क्षेत्र घोषित करते हुए वहाँ कोयला खनन पर रोक लगा दी गई थी। जो भूपेश बघेल एक साल पहले अपने ट्वीट में कह रहे थे कि “अडानी को पिछले दरवाजे से कोयला खदान देने के लिए मोदी सरकार ने एमडीओ का रास्ता निकाला है” वही अब सत्ता पाकर या अडानी से डील कर उनका स्वागत कर रहे हैं ?
इन खदानों में कोयला खनन का सिलसिला शुरू होने से हसदेव अरण्य के लगभग पौने दो लाख हेक्टेयर में फैले घने जंगल को अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। यह कितना बड़ा जंगल है यह इससे समझा जा सकता है कि मुंबई, दिल्ली और बेंगलूर जैसे शहरों को मिलाकर भी इसके क्षेत्रफल की बराबरी नहीं की जा सकती है। इस विशालकाय जंगल में पूंजीपतियों को पर्यावरण की कीमत पर संसाधनों की लूट की छूट देना यह बताता है कि दोनों दलों की नीतियों में कोई खास फर्क नहीं है। सिर्फ देश की जनता को पर्यावरण की जागरूकता के नाम पर जनता को मूर्ख बना रहे हैं?

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