नरेश दीक्षित

कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2005 में सूचना का अधिकार कानून भारत के समस्त नागरिकों को सरकार एवं सरकारी कार्यलयों से उनके क्रिया-कलापों की सूचना प्राप्त करनें का एक क्रांति कारी हथियार सौंपा था। सूचना अधिकार कानून लागू होने के पश्चात देश का कोई भी साधारण नागरिक सरकार एवं सरकारी विभागों से उनके क्रिया-कलापों की सूचना एक साधारण प्रार्थना पत्र के साथ दस रूपये का पोस्टल आर्डर अथवा नगद जमा कर संबधित विभाग के सूचना अधिकारी से सूचना प्राप्त कर सकता है। सूचना 30 दिन के अंदर प्रार्थी को उपलब्ध कराने की कानूनी बाध्यता है।
इस कानून के लागू होने से सरकार एवं सरकारी विभागों में हड़कंप मच गया था। कालांतर में कई राज्य सरकारों एवं केंद्र सरकार ने भी सूचना अधिकार में अपने मन मुताबिक समय-समय पर संशोधन भी करते रहे हैं इसके दायरे से सीबीआई, केंद्रीय सुरक्षा बलों, विजिलेंस जांचों तथा आर्थिक अपराध की गोपनीय जांचों आदि से सरकारें अपनी चमड़ी बचाने के लिए सूचना अधिकार से अलग कर दिया है। साथ ही देश की हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने दस रूपये की प्राथमिक फीस से बढ़ा कर पांच सौ रुपये से भी अधिक कर दिया है जो देश के आम नागरिकों के लिए न्याय संगत नहीं है।
फिर भी देश के नागरिकों के लिए यह अधिकार सरकार व सरकारी विभागों से भ्रष्टाचार उजागर करने में एक सशक्त हथियार बना हुआ है। मोदी सरकार देश की जनता को प्राप्त इस अधिकार को कुचलना चाहती हैं और सरकार के अंकुश में रखना चाहती हैं। सरकार ने एक रणनीति के तहत सूचना अधिकार अधिनियम संशोधन विल 2019 संसद और राज्य सभा में कांग्रेस एवं विपक्षी दलों के कभी विरोध के बाद भी संख्या वल के आधार पर पास कर लिया है। इस संशोधन से केन्द्रीय सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त और राज्यो के सूचना आयुक्तों की आजादी संशोधन से खत्म हो जायेगी।
अभी तक सूचना आयुक्तों को, चुनाव आयुक्तों की भांति अधिकार एवं आजादी प्राप्त थी। वह अब सूचना केन्द्र सरकार या कार्यपालिका की अफसर शाही के नियंत्रण में होगी। सूचना कानून नागरिक अधिकारों के लिये अधिक जरूरी है। क्योंकि देश के नागरिकों को जब वैधानिक तरीके से सूचना मिलेगी तभी तो वह सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करेगा। शासन की सही जानकारी से ही सार्वजनिक सिस्टम के भ्रष्टाचार का खुलासा संभव होगा। एक पूर्व सूचना आयुक्त ने सूचना अधिकार कानून के मामले में मोदी सरकार की गलत नियत की बात कही है। यह भी सच है कि इस तरह के संशोधनों से अफसरशाही व सरकार से सूचना लेने के अधिकार पंगु एवं लचर होंगे।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार और सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को सामने लाने व उन्हे समाप्त करने का प्रयास इस कानून के माध्यम से जनता को दिया था। चूँकि इस अधिनियम के लागू रहने से सबसे अधिक मोदी सरकार के गले की हड्डी साबित हो रहा है। सूचना कानून से ही पता चला कि आरबीआई के पूर्व गवर्नर ने कर्ज़ न चुकाने वालों की सूची सरकार को सौंपी थीं, इसी से प्रधानमंत्री व स्मृति ईरानी की शैक्षिक योग्यता का खुलासा हुआ, नोट बंदी के प्रस्ताव से आरबीआई से सहमत न लेने, देश के काले धन की अबतक उजागर रकम के संबद्ध सवालों पर मोदी सरकार को शर्मसार होना पड़ा है।
इन सभी जवाब देही से बचने के लिए सरकार ने सूचना अधिकार कानून की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का काम किया है। सरकार और ब्यूरोक्रेट मिल कर जो घपले-घोटाले कर रहे हैं उन्हें छुपाया जाएं, घपले आप क्यों करना चाहते हैं देश से क्या छिपाना चाहते है? सूचना पर पाबंदी-बोलने पर पाबंदी लगा देना, असलियत में बड़े-बड़े घपले जो उजागर हुए हैं वह सूचना अधिकार से ही हुए हैं सरकार अब कोई ड्रेमोकेटिक इंस्टीट्यूशन छोड़ना नहीं चाहती जिसमें संशोधन करने के लिए उतावली न हो? मोदी-शाह को अब तो सूचना अधिकार के साथ ही अखबार और मीडिया को भी बंद कर देना चाहिए जनता को इसकी क्या जरूरत है?
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