नरेश दीक्षित

1990 के दशक में कश्मीर घाटी में आतंकवाद चरम के समय बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया ऐसा प्रचार किया जाता है। कश्मीरी पंडित समूह और कुछ हिन्दू दक्षिणपंथी यह संख्या चार लाख से सात लाख बतातें है। लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या से बहुत अधिक है। असल में कश्मीरी पंडितों की आखिरी गिनती 1941 में हुई थी और उसी में 1990 का अनुमान लगाया जाता है।
इसमें 1990 के पहले रोजगार तथा अन्य कारणों से कश्मीर छोड़कर चले गए कश्मीरी पंडितों की संख्या घटाई नहीं जाती। अहमदाबाद में बसे कश्मीरी पंडित पी एल डी परिमू ने अपनी किताब ‘कश्मीर एंड शेर-ए-कश्मीर: एक पथच्युत क्रांति’ में 1947-50 के बीच कश्मीर छोड़कर गए पंडितों की संख्या कुल पंडित आबादी का 20 प्रतिशत बताया है (पेज -244)।
चित्रलेखा जुतशी ने अपनी किताब “लेंग्वेजज आफ बिलाॅगिंग इस्लाम रीजनल आइडेंटिटी एंड मेकिंग आफ कश्मीर ” में इस विस्थापन की वजह नेशनल काॅनफेंस द्वारा लागू किए गए भूमि सुधार को बताया है (पेज-318) जिसमें जम्मू कश्मीर में जमीन का मालिकाना उन गरीब मुसलमानों, दलितों तथा अन्य खेतिहरों को दिया गया था जो वास्तविक खेती करते थे। इसी दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम और राजपूत जमींदार भी कश्मीर के बाहर चले गए थे।
ज्ञातव्य है कि डोगरा शासन के दौरान डोगरा राजपूतों, कश्मीरी पंडितों और कुलीन मुसलमानों के छोटे से तबके ने कश्मीर की लगभग 90 प्रतिशत जमीनों पर कब्जा कर लिया था। ( विस्तार के लिए देखें “हिन्दू रुलर्स एंड मुस्लिम सबजेकटस ” (मृदु राय की किताब)। राजनीति विज्ञानी अलेक्जेंडर इवांस ने विस्थापित पंडितों की संख्या डेढ़ लाख से एक लाख साठ हजार बतातें है। परिमू यह संख्या ढ़ाई लाख बतातें है। सीआईए ने एक रिपोर्ट में यह संख्या तीन लाख बताई है।
अनंतनाग के तत्कालीन कमिश्नर आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह कश्मीर पंडित संघर्ष समिति श्रीनगर की 7 अप्रैल 2010 प्रेस रिलीज के हवाले से बताते हैं कि लगभग 3000 कश्मीरी पंडित परिवार स्थितियों के सामान्य होने के बाद 1998 के आस-पास कश्मीर से पलायित हुए थे (देखें पेज 79 माई कश्मीर: द डाइंग आफ द लाईट वजाहत हबीबुल्ला)।
कश्मीर में अब भी कोई साढ़े तीन हजार कश्मीरी पंडित घाटी में रहते हैं, बीस हजार से अधिक सिख भी है और नब्बे के दशक के बाद उन पर अत्याचार की बड़ी घटना नहीं हुई है। हां हर आम कश्मीरी की तरह उनकी अपनी आर्थिक समस्याएं हैं जिस पर अक्सर कोई ध्यान नहीं देता। साथ ही एक बड़ी समस्या लड़को की शादी को लेकर है क्योकि पलायन कर गए कश्मीरी पंडित अपनी बेटियों को कश्मीर नहीं भेजना चाहते।
परिमू ने अपनी किताब में बताया है कि उसी समय लगभग पचास हजार मुसलमानों ने घाटी छोड़ी। कश्मीरी पंडितों को तो कैम्पों में जगह मिली, सरकारी मदद् और मुआवजा भी। लेकिन मुसलमानों को ऐसा कुछ नहीं मिला। सीमा काजी अपनी किताब “बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशन ” में ह्यूमन राईट वाच की एक रिपोर्ट के हवाले से बताती हैं कि 1989 के बाद से पाकिस्तान में 38000 शरणार्थी कश्मीर से पहुँचे थे।
केपले महमूद ने अपनी मुजफ्फराबाद यात्रा में पाया कि सैकड़ों मुसलमानों को मार कर झेलम में बहा दिया गया था। इन तथ्यों को साथ लेकर वह भी उस दौर में सेना और सुरक्षा बलों के अत्याचार से 48000 मुसलमानों के विस्थापन की बात कहती है। अफसोस कि 1947 के जम्मू नरसंहार की तरह इस विस्थापन पर कोई बात नहीं होती (विस्तार के लिए इंटरनेट पर वेद भसीन के उपलब्ध साक्षात्कार या फिर सईद नकवी की किताब “बीइंग द अदर” के पेज 173-193 देखें )।
हत्यारों का उद्देश्य था कश्मीर की अर्थव्यवस्था, न्याय व्यवस्था और प्रशासन को पंगु बना देने के साथ अपने हर वैचारिक विरोधी को मार देना था। इस दौरान मरने वालों में नेशनल कांफ्रेंस के नेता मोहम्मद युसुफ हलवाई, मीरवायज मौलवी फारूख, नब्बे वर्षीय पूर्व स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी मौलाना मौदूदी, गूजर समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित नेता काजी निसार अहमद, विधायक मीर मुस्तफा, श्रीनगर दूरदर्शन के डाइरेक्टर लासा कौल, एचएमटी के जनरल मैनेजर एचएल खेरा, कश्मीर विश्वविद्यालय के उप कुलपति प्रोफेसर मुशीर उल हक और उनके सचिव अब्दुल गनी, कश्मीर विधान सभा के सदस्य नाजिर अहमद वानी आदि शामिल थे।
जाहिर है आतंकवादियों के शिकार सिर्फ कश्मीरी पंडित नहीं मुस्लिम भी थे। हाँ पंडितों के पास पलायित होने के लिए जगह थी, मुसलमानों के लिए वह भी नहीं। वे कश्मीर में ही रहे और आतंकवादियों तथा सुरक्षा बलों दोनों के शिकार होते रहे। कश्मीर से पंडितों के पलायन में जगमोहन की भूमिका को लेकर कई बातें होती हैं। बलराज पुरी के अनुसार जगमोहन को तब भाजपा और तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के कहने पर कश्मीर का गवर्नर बनाया गया था।
उन्होंने फारूक अब्दुल्ला की सरकारको बर्खास्त कर दिया और सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे। अल जजीरा को दिए गये एक साक्षात्कार में मृदु राय ने इस संभावना से इंकार किया है कि योजनाबद्ध तरीके से इतनी बड़ी संख्या में पलायन संभव है लेकिन वह कहतीं है कि जगमोहन ने पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए प्रेरित किया। वजाहत हबीबुल्लाह अपनी किताब लिखा है कि उन्होने जगमोहन से दूरदर्शन पर कश्मीरी पंडितों से एक अपील करने को कहा था कि वे यहाँ सुरक्षित महसूस करें और सरकार उनकी पूरी सुरक्षा उपलब्ध करायेगी।
लेकिन जगमोहन ने मना कर दिया, इसकी जगह अपने प्रसारण में उन्होने कहा कि पंडितों की सुरक्षा के लिए रिफ्यूजी कैम्प बनाये जा रहे हैं, जो पंडित डरा हुआ महसूस करें वे इन कैम्पों में जा सकतें हैं, जो कम॔चारी घाटी छोड़ कर जायेंगे उन्हे तनख्वाहें मिलती रहेंगी। जाहिर है इन घोषणाओं ने पंडितों को पलायन के लिए प्रेरित किया (पेज 86 में मृदु राय ने इस तथ्य का जिक्र किया है)।
कश्मीर के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ और पत्रकार बलराज पुरी ने अपनी किताब “कश्मीर:इंसरजेंसी एंड आफ्टर ” में जगमोहन की दमनात्मक कार्यवाहियों और रवैयों को ही कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुख्य जुम्मेदार बताया है ( पेज 68-73 )। ऐसा ही निष्कष॔ भाजपा के ही विदेश राज्य मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एम जे अकबर ने अपनी किताब “बिहाइंड द वेल “में भी दिए हैं (पेज 218-20)। बलराज पुरी ने अपनी किताब में दोनों समुदायों की एक संयुक्त समिति का जिक्र किया है जो पंडितों का पलायन रोकने के लिए बनाई गई थी।
इसके सदस्य थे हाईकोर्ट जज मुफ्ती बहाउदीन फारुकी अध्यक्ष ,एच एन जट्टू उपाध्यक्ष और वरिष्ठ वकील गुलाम नबी हग्रू महासचिव। ज्ञातव्य है कि 1986 में ऐसे ही एक प्रयास से पंडितों को घाटी छोडने से रोका गया था। कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय लोकतंत्र के मुंह पर काला धब्बा है, लेकिन यह सवाल अपनी जगह है कि क़ाबिल अफसर मानें जाने वाले जगमोहन कश्मीर के राज्यपाल के रूप में लगभग 400000 सैनिकों की घाटी में उपस्थिती के बावजूद इसे रोक क्यों न सके?
अपनी किताब “कश्मीर: अ ट्रेजेडी ऑफ एरर्स” में तवलीन सिंह कहती है कि “कई मुसलमान यह आरोप लगाते हैं कि जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी छोडने के लिए प्रेरित किया। यह सच हो या नही लेकिन यह तो सच ही है कि जगमोहन के कश्मीर में आने के कुछ दिनों के भीतर वे समूह में घाटी छोड़ गए और इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि उनके जाने के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराये गए” असल में जैसा कि एक कश्मीरी पंडित उपन्यासकार निताशा कौल कहती है- कश्मीरी पंडित हिंदुत्व की ताकतों के राजनीतिक खेल के मुहरे बन गए है। विस्तार के लिए वायर में छपा उनका 7 जुलाई 2016 का लेख पढ़ लें। दिक्कत यह है कि भारतीय मीडिया संघ से जुड़े पनुन कश्मीर को ही कश्मीरी पंडितों का इकलौता प्रतिनिधि मानता है।
(अशोक कुमार पाण्डेय की वाल से )
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