नरेश दीक्षित

23 अगस्त को वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन देश की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाने का उपाय करते हुए धन कमाने वाले सट्टेबाजों पर दो महीना पहले ही बजट में लगाये गये महाअमीर शुल्क को वापस लेने का ऐलान किया है। साथ ही बड़ी आटोमोबाइल कंपनियों एवं अन्य कारपोरेटों के लिए रियायतों घोषणा की, ताकि उनकी मदद् से अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाया जा सके।
टैक्स में छूट और पूंजीगत लाभ पर लगाये गये अभिभार को खत्म करने, बैंको में 70000 हजार करोड़ रूपया डालने ताकि वे कारपोरेट सेक्टर को अतिरिक्त 5 लाख करोड़ रूपया कर्ज दे सकें, टैक्स चोरों के प्रति नरम रूख अपनाने आदि की घोषणाएं की गई है। जाहिर है कि जहाँ महाअमीरों की तिजोरी में धन डालने का इंतजाम किया गया है, वही व्यापक जनता की दुर्दशा और बदहाली को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है।
अब तो कई कारपोरेट चिन्तक भी इस बात से सहमत है कि वित्त मंत्री द्वारा बजट में की गई घोषणाओं को वापस लेने और कारपोरेट घरानों को कुछ रियायत देने से मात्र से बढ़ते संकट का समाधान नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इस आर्थिक सुस्ती की शुरुआत मुख्यतः नोटबंदी के साथ हुई थी और जी एस टी लागू करने के बाद यह और ज्यादा गंभीर हो गया।
हालांकि लोक सभा चुनाव प्रचार के समय पुलवामा और बालाकोट के बहाने राष्ट्रवाद की मुहिम चलाकर सिर पर मंडराते आर्थिक संकट से जनता का ध्यान भटकाने में मोदी सरकार और भाजपा सफल रही थी और सरकार बनाने के बाद वित्त मंत्री ने आर्थिक सर्वे के आंकड़ों में हेर-फेर कर अपना बजट पेश किया था, किन्तु कश्मीर से धारा 370 हटाने,
पाकिस्तान से घृणा और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन को अब देश भर में लागू करने की तैयारी जैसा कि आज देश के ग्रह मंत्री ने सार्वजनिक घोषणा कर स्पष्ट कर दिया है कि देश में अब एक भी विदेशी नागरिक यहाँ नहीं रहेगा? सरकार की ऐसी परियोजनाओं के जरिए अपने बहुसंख्यक हिन्दुत्व वोट बैंक के बीच उन्माद पैदा करने की कोशिशों के बावजूद एक दिन सच्चाई को तो सामने आना था, क्योंकि आर्थिक संकट इतना विकट रूप ले चुका है कि उस पर अब पर्दा डाल पाना संभव नहीं था।
यहाँ तक कि अब कारपोरेट मीडिया को भी ढहती अर्थव्यवस्था के बारे में बोलना पड़ा। सवाल यह है कि वित्त मंत्री कारपोरेट घरानों और सट्टे बाजों को दी गई इन रियायतों के जरिए क्या अर्थव्यवस्था की सुस्ती को गति प्रदान कर पायेंगी? मौजूदा दौर में जहाँ इन रियायतों का सारा फायदा बड़े कारपोरेट घराने ले लेंगे। आम जनता तक इसका रत्ती भर अशं ही पहुँच पायेगा। इसलिए बेरोजगारी बढती रहेगी और जनता की क्रय शक्ति कम होती रहेगी?
सूचना अधिकार पर अब सरकार का अंकुश!
कश्मीर का संवैधानिक तख्ता पलट कर, अब कारपोरेट को देने की तैयारी?

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