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बीएसएनएल को मोदी सरकार ने बर्बाद किया!

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नरेश दीक्षित

यह बात सभी को पता है कि किस तरह से 4 जी स्पेक्ट्रम भारत सरकार की  सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) को न देकर बाकी सब कम्पनियों को दिया गया। मोदी सरकार की मंशा मुकेश अंबानी की कम्पनी जीयो को बढ़ावा देने की थी और उसी को आगे बढ़ाने के लिए बीएसएनएल को धीमा जहर दिया गया।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रिलायंस को सिर्फ डेटा सर्विस के लिए लाइसेंस दिया गया था लेकिन बाद में 40000 करोड़ रूपये की फीस के बजाय मात्र 1600 करोड़ रूपये में ही वाॅयस सर्विस का लाइसेंस दे दिया गया। लेकिन रिलायंस जियो के पास आधार भूत ढांचे जैसे कि टावर आदि का अभाव था। यहीं से मोदी सरकार ने बीएसएनएल के आधार भूत ढांचे को धीरे-धीरे रिलायंस जियो को देना शुरू किया।
2014 में आते ही मोदी सरकार एक टावर पालिसी की घोषणा की गई और दबाव डाल कर रिलायंस जियो इंफोकाॅम लिमिटेड से भारत संचार निगम लिमिटेड के साथ मास्टर शेयरिंग समझौता करवा दिया। इस समझौते के तहत रिलायंस जियो बीएसएनएल के देश भर में मौजूद 62000 टावरों का उपयोग कर सकती थी। इनमें से 50000 में ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी उपलब्ध थी।

यह जियो के लिए संजीवनी मिलने जैसा था क्योकि यह चाहे जितना भी पैसा खर्च कर लेती इतना बड़ा आधार भूत ढ़ांचा नहीं खड़ा कर सकती थी। लेकिन उनके लिए एक और मुश्किल थी कि भारत संचार निगम लिमिटेड भी उसके कड़े प्रतिद्वंदी में से एक था जिन्हे इन टावरों से सिग्नल मिलने थे। इसलिए मोदी सरकार ने ग़जब का खेल खेला।
रिलायंस जियो को इन टावरों का निरंतर फायदा मिलता रहे इसके लिए एक अलग कम्पनी बनाकर इन टावरों को उसमें डाल दिया गया। मोबाइल टावर किसी भी टेलीकाम ऑपरेटर के लिए सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति होती है। इस कदम का परिणाम यह हुआ कि अब बीएसएनएल को भी इन टावरों की सेवाओं का उपयोग करने का किराया लगने लगा। यह निर्णय 2017 में मोदी सरकार ने लिया था जिससे बीएसएनएल अपने ही टावरों का किरायेदार बन गया।
नतीजतन जो कम्पनी 2014-15 में 672.67 करोड़ रुपए के फायदे में थी इस निर्णय के बाद हजारों करोड़ का घाटा दर्शाने लगी। कुछ समझें आप? मोदी सरकार ने बीएसएनएल को 4 जी स्पेक्ट्रम आवंटित ही नही किया और उसे बीएसएनएल से अपने टावर भी छीन लिये और बीएसएनएल को अपनी ही संपत्ति का किरायेदार बना दिया। लेकिन मोदी सरकार यही नहीं रूकी।
उसने उन राज्यो में जहाँ उनकी सरकार थी वहाँ ऐसी नीति बनाई जिससे रिलायंस जियो को फायदा पहुंचे और बीएसएनएल को कोई मौका नहीं मिले। छत्तीसगढ़ में पूर्व रमन सरकार ने एक योजना शुरू की जिसे संचार क्रांति योजना कहा गया।  वर्ष 2011 में छत्तीसगढ़ में मोबाइल की पहुँच मात्र 29 प्रतिशत थी। छत्तीसगढ़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों एवं कम जनसंख्या घनत्व के कारण दूर संचार सेवा प्रदाता कम्पनियाँ राज्य में नेटवक॔ का विस्तार नहीं कर पा रही थी।
संचार क्रांति योजना के तहत इन क्षेत्रों में टेलीकाम प्रदाता कम्पनी द्वारा नेटवर्क कनेक्टिविटी प्रदान किये जाने हेतु आधार भूत ढ़ांचा तैयार किया जाना था और 1500 से अधिक नये मोबाइल टावर लगाये जाने थे। जिस पर 600 करोड़ रूपये टावरों की स्थापना पर खर्च किये जाने थे। यानी सारा काम सरकारी खर्च पर किया जाना था। यह ठेका भी बीएसएनएल के बजाय जियो को दिया गया।
इस तरह से मोदी राज में देश की सार्वजनिक भारत संचार निगम लिमिटेड को जिसमें लाखों लोग गांव से लेकर शहर तक के परिवारों के सदस्य कार्यरत थे उनकी सामने से रोजी रोटी छीन कर अपने मित्र मुकेश अंबानी को दी।
(गिरीश मालवीया की फेसबुक वाल से)

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