नरेश दीक्षित

देश के प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह हर दिन यह बात दुहरा रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति से आतंकवाद का देश से अंत हो जायेगा जिसमें पिछले सत्तर सालों के दौरान 41000 लोग मारे गये है, कश्मीर में अब पूंजी निवेश बढ़ेगा और वहां प्रगति होगी और इससे मुट्ठीभर उपद्रवियों को छोड़कर व्यापक जनता खुश है।
किन्तु मुस्लिमों के बड़े त्यौहार ईद और मोहर्रम के मौके पर भी कश्मीर घाटी में कर्फ्यू था। यहाँ तक कि धारा 370 खत्म करने और जम्मू-कश्मीर राज्य का दर्जा घटाकर इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में तब्दील कर देने के बाद भी ज्यादातर इलाकों में कर्फ्यू लगा रहा, संचार सेवाएं बन्द रही और लैण्ड लाइन, मोबाइल एवं इंटरनेट बन्द रहे।
सरकार के दावों के विपरीत, जमीन पर हालात बिल्कुल ही सामान्य नहीं है। अगर मोदी सरकार दावा करती है कि धारा 370 और 35 ए को हटाने के फैसले से जनता खुश है तो कर्फ्यू क्यों जारी है और कश्मीर घाटी को एक खुली जेल में क्यों तबदील कर दिया गया है? सरकार भारतीय मीडिया को कश्मीर की सच्ची खबरें प्रकाशित करने से क्यों रोक रही है?
सरकार यह प्रतिबंध कब तक जारी रखेगी? 5 अगस्त को धारा 370 हटाने के फैसले के बाद से यह सब हो रहा है। अब यह बात उजागर हो रही है कि धारा 370 और 35ए खत्म करने के पीछे एक सोची समझी रणनीति है, क्योंकि ये धाराएं कारपोरेट सट्टेबाजों और वित्तीय थैलीशाहों द्वारा कश्मीरियों और वहां के संसाधनों की बेरोकटोक लूट की राह में बाधा थी।
मोदी सरकार अपनी कारपोरेटी करण के लिए बिचौलिये का काम कर रही है, पहले ही भारत की अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व तबाही के कगार पर पहुँचा चुकी है। यह संकट विभिन्न रूपों में सामने आ रहा है। किन्तु भारत के अन्य हिस्सों के विपरीत अपने विशेष दर्जे की वजह से बचा था। पूरे कश्मीरी जनता के मौलिक अधिकारों का हनन कर उन्हे पिंजरे में बन्द कर संवैधानिक तख्ता-पलट के बाद, अब मोदी सरकार विदेशी और भारतीय कारपोरेट लुटेरों के स्वागत में लाल कालीन बिछा रही हैं।
इस कार्य को सुगम बनाने के लिए मोदी सरकार इस वर्ष 12 से 14 अक्टूबर तक श्रीनगर में वैश्विक निवेशक सम्मेलन आयोजित करने जा रही है। मुकेश अंबानी के रिलायंस तथा भारतीय उद्योग परिसंघ को इस कार्य का जिम्मा सौंपा गया है। मजेदार बात यह है कि रिलायंस इंडस्ट्री लिमिटेड खुद संकट में है और इससे बाहर आने के लिए उसने सउदी अरब की सबसे बड़ी तेल कम्पनी ‘अरामको’ के साथ रणनीतिक सौदा किया है।
इस सौदे के तहत रिलायंस इंडस्ट्री 1.1 लाख करोड़ रूपये की कीमत पर अपना 20 प्रतिशत मालिकाना हक अरामको को सौपेगी। इस सौदे ने अन्य चीजों के अलावा मोदी द्वारा काश्मीर के मामले में उठाये गये कदम के लिए सउदी अरब का समर्थन सुनिश्चित कर दिया है। मोदी सरकार कश्मीर के मामले में उठाये गये अपने कदम के लिए साम्राज्यवादी ताकतों का समर्थन हासिल करने में सफल हुई है।
इस संदर्भ में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने हताशापूण॔ टिप्पणी की है कि दुनिया की अग्रणी शक्तियां “इस मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करेंगी क्योंकि भारत में उनका आर्थिक हित है जहां उनमें से कई ने भारी मात्रा में निवेश किया है “। इस टिप्पणी से कश्मीर में उठाये गये कदम के पीछे की राजनीति साफ हो जाती है।
देश के महाअमीरों के लिए सरकार का उपहार?
'अडानी' के लिए एक लाख पेड़ों की बलि चढ़ेगी!

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