नरेश दीक्षित (संपादक समर विचार)

हम लोगो के मन में राजीव गांधी को जानने -समझने उत्कंठा इस लिए भी ज्यादा थी, क्योंकि वह राजनीति के लिए अपनी मां की पहली पसंद नही थे। संजय गांधी ने सियासत की शुरुआत 1970 के ही दशक से कर दी थी। कांग्रेस की रीति नीति में उनका खासा दखल था, पर एक हवाई दुर्घटना उनको असमय लील गई थी।
राजीव गांधी उन दिनो इंडियन एयरलाइंस में पाइलट थे। आम मध्यम वर्गीय भारतीयों जैसी सहज-सरल जिंदगी उन्हे और उनके छोटे से परिवार को रास आती थी। हालात ऐसे बने कि उन्हे राजनीति के गन्दे तालाब में कूदना पड़ा।
क्या पता था कुछ समय पश्चात इंदिरा गांधी भी हादसे की शिकार हो जायेगी और राजीव गांधी अचानक प्रधानमंत्री बन जायेंगे? क्या आप को नही लगता कि राजीव गांधी के जीवन में संयोगों से ज्यादा दुयोगों की भूमिका थी?
यह यकीनन औरो से अलग थे, इस लिए सतक॔ता बरतने की खुफिया सूचनाओ के बाद ‘अपने लोगो’ से मिलने के लिए उतावले रहते और इसी वजह से उन्होंने जान गंवाई। जो भूल गए उन्हे याद दिला दूं। उस समय देश में आम चुनाव हो रहे थे।
केंद्र और विभिन्न राज्यो की एजेंसियो के पास इनपुट था कि उन पर लिट्टे अथवा खालिस्तान समथ॔क आतंकवादी हमला कर सकते है। हर जन सभा से पहले उन्हे चेताया जाता कि आप खुद अधिक एक्सपोज न करें।
तमिलनाडु में खतरा कुछ अधिक था। वह इस तथ्य को जानते थे, फिर भी उन्होने वहां का दौरा टालने की कोशिश नही की। उस समय एसपीजी सिर्फ प्रधानमंत्री को सुरक्षा मुहैया कराती थी । उनकी हत्या के बाद सरकार ने इसका दायरा बढाया था।
अब यह प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्रियों, उनके परिजनो और गांधी परिवार की हिफाजत करती है। यह एक बेहतरीन सुरक्षा ईकाई है और इसके अस्तित्व में आने के बाद किसी प्रधानमंत्री पर कोई बड़ा हमला नही हुआ।
राजीव गांधी पर मंडरा रहे खतरे के मद्देनजर उनकी सुरक्षा के समुचित इंतजाम क्यो नही किए गए? इस सवाल का आज तक सटीक उत्तर नही मिल सका है। यह तो राजीव गांधी के व्यक्तित्व का निजी पहलू था, पर बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने कई ऐसे काम किए जो उनकी बेहतरीन हुक्मरान होने की मुनादी करते रहेंगे।
पंजाब में अमन, उत्तर -पूर्व शांति और देश की दूरसंचार तथा कंप्यूटर क्रांति उन्ही की देन है । सियासत उनकी मूल प्रकृति का हिस्सा नही थी, इस लिए उन्हे समझने में देर लगी कि राजनीति वंचनाओ का दुग॔ होती है। यही वजह है कि उनके सलाह कारो ने उन्हे श्री लंका में जरूरत से ज्यादा आगे बढने के लिए प्रेरित किया।
उन्हे दूसरो से ज्यादा अपनो से दुख मिला। अगर उनमें सियासी शातिरपना होता, तो शायद बोफोर्स के दलदल में न फंसते, मगर ऐसा कौन सा राज नेता है जिस पर दाग नही लगे? हुकूमत उस काजल की कोठरी का दूसरा रूप है, जिसमें कदम रखने पर दामन बेदाग रह ही नही सकता।
संसार के समस्त सत्तानायकों को इसका दंश भोगना पड़ा है। राजीव गांधी भी इसका अपवाद न थे। इस वक्त अगर वह जिंदा होते, तो आज अपने जीवन के 75 वें वष॔ में प्रवेश कर रहे होते । उन्हे उस दौर में असमय जाना पड़ा, जब वह संघर्षो की आग में तप कर खरा सोना बन चुके थे और देश को उनकी जरूरत थी।
(वरिष्ठ पत्रकार श्री शशि शेखर की वाल के कुछ अंश)
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